किसानों के आन्दोलन के लिए आखिर कौन जिम्मेदार ?

आखिर क्या है फार्मर प्रोटेस्ट का असली कारण ?


दोस्तों आजकल टीवी में आपने धरना और आन्दोलन प्रदर्शन करने वाले पगड़ी धारी सरदारों और किसानो को तो देखा ही होगा | और ये भी सुना होगा कि मोदी सरकार यानि कि वर्तमान केंद्र सरकार किसानों के साथ गलत कर रही है , उसे ऐसा नहीं करना चाहियें था |

तो मोदी सरकार ने ऐसा क्या कर दिया और उसे क्या नई करना चाहिए था , आईये जानते हैं , निचे लिखे हुए आर्टिकल को ध्यान से पढ़ कर….

आपमें से कुछ को तो पता होगा कि ये धरना प्रदर्शन या आन्दोलन उस नए कृषि बिल के खिलाफ किया जा रहा है , जो जून 2020 में भारतीय संसद द्वारा पारित किया गया था |

और जिन लोगों को इसके बारे में कुछ भी पता नहीं है फिर भी डोंट वर्री | आज मैं आपलोगों को इसके बारे में शुरू से लेकर अंत तक पूरा जानकारी देने जा रहा हूँ |

तो चलिए अब मुद्दे पे आते हैं | दोस्तों आपकों इस जानकारी को पढने के बाद कोई कंफ्यूजन ना रहे इसलिए सबसे पहले आप इस बिल को पढ़ लीजिये , जो संसद द्वारा जून 2020 को पारित किया गया था |


 #1.कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक , 2020


इस बिल के अंतर्गत इम्पोर्टेन्ट पॉइंट हैं –


  1. किसान बेहतर मूल्य पर अपने कृषि उत्पाद को अपनी पसंद के स्थान पर बेच सकता है , जिससे संभावित खरीददारों की संख्या में बढ़ोतरी होगी |
  2. आवश्यक वस्तु अधिनियम की सूचि से खाद्यान तिलहन और दलहन फसलों के साथ प्याज और आलू जैसे प्रमुख फसलों को बाहर कर दिया है |
  3. किसान अपनी फसलों का सौदा सिर्फ अपने ही नहीं , बल्कि दुसरे राज्य के लाइसेंसी व्यापारियों के साथ भी कर सकते हैं |
  4.  इससे बाजार में प्रतिस्पर्धा होगी , और किसानों को अपने मेहनत की अच्छे दाम भी मिलेंगे |
  5. इस विधेयक के अंतर्गत पैन नंबर रखने वाला व्यापारी ही व्यापार के लिए योग्य होगा |
  6. किसान या व्यापारी , इलेक्ट्रोनिक ट्रेडिंग प्लेटफोर्म के माध्यम से एक व्यापार क्षेत्र में राज्य के अन्दर या दुसरे राज्यों के साथ व्यापार में शामिल हो सकते हैं |
  7. इस विधेयक से देश भर में किसानों को उपज बेचने के लिए ‘ वन नेशन वन मार्केट ‘ की अवधारणा को बढ़ावा मिलेगा |

# 2. कृषक ( सशक्तिकरण और संरक्षण ) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक , 2020


इस बिल के अंतर्गत इम्पोर्टेन्ट पॉइंट हैं –


  1. अब किसान उपज से खाद्य उत्पाद बनाने वाली कंपनियों , थोक और फुटकर विक्रेताओं और निर्यातों को आदि के साथ उपज की बिक्री के लिए सीधा करार या व्यावसायिक समझौता कर सकेंगे |
  2. किसी कंपनी या व्यवसायी के साथ उपज की बिक्री का करार हो जाने के बाद फसल की अच्छी पैदावार के लिए आवश्यक साधन या इनपुट्स उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी खरीददार की होगी |
  3. खरीददार द्वारा उपयुक्त कृषि मशीनरी तथा उपकरण की व्यवस्था की जायेगी |
  4. खरीददार द्वारा किसानों को तकनिकी मार्गदर्शन और सलाह उपलब्ध कराई जायगी तथा फसलों की जोखिम की पूरी या आंशिक जिम्मेदारी उठानी होगी |
  5. फसल उत्पादन के दौरान फसल पर किसान का मालिकाना हक़ बना रहेगा एवं फसल का बिमा कराया जाएगा तथा आवश्यकता हो जाने पर किसान वित्तीय संस्थानों से ऋण भी ले सकेंगे |
  6. समझौतों के अंतर्गत उगाई फसलों को कृषि उपज की बिक्री से सम्बन्धित नियमो व कानूनों और आवश्यक वस्तु अधिनियम के प्रावधानों से मुक्त रखा जायेगा |

#3.आवश्यक वस्तु विधेयक , 2020


इस प्रस्तावित कानून में आवश्यक वस्तुओं की सूची से कृषि वस्तुओं जैसे अनाज, दाल, तिलहन, प्याज और आलू को सूचीबद्ध किया गया है। परिस्थितियों के अलावा सामान्य परिस्थितियों में हटाने का प्रस्ताव और ऐसी वस्तुओं पर लागू होने वाले भंडार की सीमा को भी समाप्त कर दिया जाएगा।

मोदी सरकार ने लोकसभा में तीन कृषि बिलों को पारित किया जिसको लेकर देश भर के किसानों द्वारा जबरदस्त विरोध हो रहा है। यहां तक कि बीजेपी के साथ गठबंधन वाली पार्टियां भी इसका विरोध कर रही हैं । मौजूदा सत्तारूढ़ गठबंधन की वरिष्ठ मंत्री ‘ हरसिमरत कौर बादल ‘ ने इनके विरोध में मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया ।
आखिर क्यों किया जा रहा है विरोध ?

किसान संगठनों और विपक्षी दलों का कहना है कि इस कानून को भारतीय खाद्य व कृषि व्यवसाय पर हावी होने की इच्छा रखने वाले बड़े उद्योगपतियों के फायदे के लिए बनाया गया है। यह किसानों की मोल-तोल करने की शक्ति को कमजोर कर देगा । इसके अलावा, बड़ी निजी कंपनियों, निर्यातकों, थोक विक्रेताओं और प्रोसेसर को इससे कृषि क्षेत्र में बढ़त मिल सकती है।


इन बिलों से लाभ क्या होगा ?


इसका उद्देश्य कृषि में निजी निवेश / एफडीआई को आकर्षित करना है और साथ ही मूल्य के अस्थिरता को स्थिरता में बदलन है । विपक्ष का कहना है कि इससे बड़ी कंपनियों को इन कृषि बिलों से फायदा ही फायदा होगा पर किसानो को भुगतना पद सकता है , घाटा | क्योंकि सरकार एमएसपी (MSP ) को हटा देगी |

जबकि केंद्रीय कृषि मंत्री ‘ नरेन्द्र सिंह तोमर ‘ का  कहना है कि किसानों के लिए फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एसएमपी) की व्यवस्था जारी रहेगी। इसके अलावा, प्रस्तावित कानून राज्यों के एग्रीकल्चर प्रोड्यूस मार्केटिंग समिति (APMC) कानूनों का उल्लंघन नहीं करता है । ये बिल यह सुनिश्चित करने के लिए हैं कि किसानों को मंडियों के नियमों के अधीन होने के बिना उनकी उपज का बेहतर मूल्य मिले।

उन्होंने कहा है कि ये अर्थव्यवस्था यह सुनिश्चित करेगी कि किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य मिले, इससे प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और निजी निवेश के साथ-साथ कृषि क्षेत्र में बुनियादी ढांचे का विकास भी होगा और रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे।


MSP क्या होता है ?


सरकार किसान की फसल के लिए एक न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित करती है, जिसे MSP कहा जाता है। इसका फुल  फॉर्म ” मिनिमम सपोर्ट प्राइस” होता है |

यह एक तरह से सरकार की तरफ से गारंटी होती है कि हर हाल में किसान को उसकी फसल के लिए तय दाम मिलेंगे।

अगर मंडियों में किसान को MSP या उससे ज्यादा पैसे नहीं मिलते तो सरकार किसानों से उनकी फसल MSP पर खरीद लेती है। इससे बाजार में फसलों की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव का किसानों पर असर नहीं पड़ता।

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